कुर्मी किसके? पूर्वांचल के कुर्मी बहुल इलाकों में तेज हुई राजनीतिक वर्चस्व की जंग

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राष्ट्रीय जनसरदार पार्टी की सक्रियता से बदले समीकरण; भाजपा, अपना दल (एस) और अपना दल कमेरावादी की रणनीतियों पर टिकी निगाहें

लखनऊ | कुर्मी वर्ल्ड डेस्क

उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कुर्मी वोटों को लेकर राजनीतिक दलों के बीच खींचतान तेज होती दिखाई दे रही है। खासकर पूर्वांचल के कुर्मी बहुल जिलों में अपना दल (एस), भारतीय जनता पार्टी, अपना दल कमेरावादी और राष्ट्रीय जनसरदार पार्टी के बीच प्रभाव स्थापित करने की राजनीतिक लड़ाई चर्चा का विषय बन गई है।

हेमन्त चौधरी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनसरदार पार्टी सामाजिक न्याय और कुर्मी समाज से जुड़े मुद्दों को लेकर प्रदेश के विभिन्न जिलों में अपनी सक्रियता बढ़ा रही है। पार्टी के कार्यक्रमों और संगठनात्मक गतिविधियों के कारण पूर्वांचल की राजनीति में नए समीकरण बनने की चर्चा है। हालांकि पार्टी के वास्तविक जनाधार का आकलन आगामी चुनावों और संगठनात्मक विस्तार के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

भाजपाअपना दल गठबंधन की पुरानी साझेदारी

उत्तर प्रदेश में अपना दल (एस) को प्रमुख रूप से कुर्मी समाज के प्रभाव वाले क्षेत्रीय दल के रूप में देखा जाता है। मिर्जापुर, वाराणसी, जौनपुर, प्रयागराज, प्रतापगढ़ और फतेहपुर सहित पूर्वांचल के कई जिलों में पार्टी की राजनीतिक उपस्थिति रही है। भाजपा और अपना दल के बीच गठबंधन की शुरुआत वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव से हुई थी। भाजपा की ओर से 24 मार्च 2014 को गठबंधन की औपचारिक घोषणा की गई थी। इसके बाद अलग-अलग चुनावों में दोनों दल साथ मिलकर मैदान में उतरते रहे हैं।

इस साझेदारी ने जहां अपना दल (एस) को सत्ता और राष्ट्रीय राजनीति में भागीदारी दिलाई, वहीं भाजपा को पूर्वांचल के कुर्मी मतदाताओं के बीच अपनी पहुंच मजबूत करने में सहायता मिली। इसके बावजूद दोनों दलों के बीच हिस्सेदारी, प्रतिनिधित्व और राजनीतिक प्रभाव को लेकर समय-समय पर मतभेदों की खबरें सामने आती रही हैं।

पंकज चौधरी को जिम्मेदारी देने के राजनीतिक मायने

भाजपा ने केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी को उत्तर प्रदेश का प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। पार्टी की आधिकारिक वेबसाइट पर भी उन्हें भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बताया गया है। पंकज चौधरी को प्रदेश संगठन की कमान मिलने को भाजपा की पिछड़ा वर्ग और विशेष रूप से कुर्मी समाज के बीच पकड़ मजबूत करने की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।

इससे पहले स्वतंत्र देव सिंह भी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रहे। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा के भीतर कुर्मी नेतृत्व को आगे बढ़ाने की लगातार कोशिशों के बावजूद पूर्वांचल में अनुप्रिया पटेल की राजनीतिक पकड़ को सीधे चुनौती देना आसान नहीं रहा है।

प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद पंकज चौधरी का मिर्जापुर दौरा भी चर्चा में रहा। उन्होंने चुनार क्षेत्र के मगरहा गांव में भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ओमप्रकाश सिंह से शिष्टाचार मुलाकात की। इस बैठक में संगठन की मजबूती और प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य पर चर्चा होने की जानकारी सामने आई थी।

राष्ट्रीय जनसरदार पार्टी की सक्रियता से किसे नुकसान?

राष्ट्रीय जनसरदार पार्टी का दावा है कि प्रदेश में कुर्मी समाज के लोग न्याय, सुरक्षा और राजनीतिक भागीदारी से जुड़े मुद्दों पर उसके साथ जुड़ रहे हैं। पार्टी अपनी राजनीति को केवल चुनावी प्रतिनिधित्व तक सीमित रखकर सामाजिक अधिकारों की आवाज के रूप में प्रस्तुत कर रही है।

राजनीतिक जानकारों के अनुसार यदि राष्ट्रीय जनसरदार पार्टी पूर्वांचल में संगठनात्मक ढांचा मजबूत करने में सफल होती है तो सबसे अधिक चुनौती अपना दल (एस) के सामने खड़ी हो सकती है। इसका कारण यह है कि दोनों दलों की राजनीति में कुर्मी समाज के मतदाताओं की महत्वपूर्ण भूमिका है।

इसके साथ ही अपना दल कमेरावादी भी कुर्मी समाज और पिछड़े वर्ग की राजनीति में सक्रिय है। ऐसे में एक ही सामाजिक आधार पर सक्रिय अनेक दलों के कारण कुर्मी मतों के विभाजन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी बना बड़ा सवाल

आगामी विधानसभा चुनाव से पहले अपना दल (एस) भाजपा सरकार और संगठन में अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी बढ़ाने की अपेक्षा कर सकता है। वहीं भाजपा अपने संगठन से जुड़े कुर्मी नेताओं को आगे बढ़ाकर क्षेत्रीय सहयोगियों पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर सकती है।

कुर्मी राजनीति के सामने एकता की चुनौती

फिलहाल अनुप्रिया पटेल के नेतृत्व वाला अपना दल (एस) कुर्मी राजनीति में एक महत्वपूर्ण शक्ति बना हुआ है। पार्टी के पास संगठन, सत्ता में भागीदारी और वर्षों से तैयार किया गया राजनीतिक आधार मौजूद है। दूसरी ओर अपना दल कमेरावादी और राष्ट्रीय जनसरदार पार्टी अपने-अपने तरीके से समाज के बीच जगह बनाने का प्रयास कर रही हैं। भाजपा भी पंकज चौधरी सहित अपने कुर्मी नेताओं के माध्यम से इस मतदाता वर्ग तक सीधी पहुंच मजबूत करने में जुटी है।

अब बड़ा प्रश्न यह है कि कुर्मी समाज अलग-अलग राजनीतिक दलों और नेताओं में बंटेगा अथवा शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा, सामाजिक न्याय और उचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे साझा मुद्दों के आधार पर अपनी दिशा तय करेगा।

वर्ष 2027 का विधानसभा चुनाव यह स्पष्ट कर सकता है कि पूर्वांचल के कुर्मी मतदाताओं का भरोसा पुराने राजनीतिक नेतृत्व पर कायम रहता है या कोई नया दल और नेतृत्व उनके बीच प्रभाव स्थापित करने में सफल होता है