गार्गी सिंह पटेल पर हमले के बाद उठे सवाल: क्या राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ भी दल और जाति देखकर तय होती हैं

चंदौली में समाजवादी पार्टी की महिला इकाई की जिला अध्यक्ष गार्गी सिंह पटेल पर घर में घुसकर जानलेवा हमला होता है। यह केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं बल्कि लोकतांत्रिक राजनीति में सक्रिय महिला नेतृत्व पर हमला है। ऐसे मामलों में राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और तथाकथित सामाजिक न्याय के नेताओं की पहली जिम्मेदारी स्पष्ट और निर्भीक आवाज उठाना होना चाहिए।

लेकिन यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आवाज कब उठती है और कब मौन साध लिया जाता है?

जब यह चर्चा फैली कि हमलावर यादव बिरादरी से जुड़े हैं, तब PDA की राजनीति का झंडा उठाने वाले कई बड़े चेहरे और उनके समर्थक असहज मौन में दिखाई दिए। वहीं विरोधी दलों के नेताओं ने इसे समाजवादी पार्टी के चरित्र से जोड़कर हमला शुरू कर दिया। लेकिन जैसे ही हमलावरों के भाजपा से संबंधों की बात सामने आई, वही लोग अचानक सक्रिय हो गए और इसे भाजपा की मानसिकता बताने लगे।

मूल प्रश्न यह नहीं है कि आरोपी किस दल, जाति या विचारधारा से जुड़े हैं। असली प्रश्न यह है कि क्या अपराध और न्याय के मुद्दों पर राजनीतिक नैतिकता भी पहचान और सुविधा के आधार पर तय की जाएगी?

जो नेता छोटी-छोटी घटनाओं पर तुरंत ट्वीट कर देते हैं, वे अपनी ही पार्टी की महिला जिला अध्यक्ष पर हुए गंभीर हमले पर मौन क्यों रहे? क्या सामाजिक न्याय केवल भाषणों और नारों तक सीमित रहेगा? क्या संविधान की रक्षा और PDA की राजनीति जमीन पर ऐसे ही उतरेगी?

दूसरी ओर “नारी सम्मान” की राजनीति करने वाले भी इस मामले में दिखाई नहीं पड़े। बुलडोजर और कानून व्यवस्था की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले नेताओं की चुप्पी भी बहुत कुछ कहती है। कुछ प्रवक्ताओं को आगे कर देने भर से संवेदनशीलता साबित नहीं होती।

इस घटना ने राजनीतिक दलों की कथनी और करनी के बीच अंतर पर भी बहस को जन्म दिया है। महिला सुरक्षा, सामाजिक न्याय, संविधान की रक्षा और कानून व्यवस्था जैसे मुद्दों पर लगातार बयान देने वाले नेताओं की प्रतिक्रिया को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि समाज के कई वर्ग, विशेषकर कुर्मी समाज, हर राजनीतिक दल में केवल संख्या और उपयोग की वस्तु बनकर रह जाते हैं। चुनाव के समय सम्मान, भागीदारी और प्रतिनिधित्व की बातें होती हैं, लेकिन संकट के समय वही समाज खुद को अकेला पाता है।

समाज को यह समझना होगा कि राजनीतिक सम्मान केवल नारों से नहीं मिलता। उसके लिए संगठित चेतना, आत्मसम्मान और स्वतंत्र सामाजिक-राजनीतिक शक्ति आवश्यक है। अपनी सुरक्षा, अपनी तरक्की और अपनी राजनीतिक हैसियत के लिए समाज को स्वयं सजग और संगठित होना पड़ेगा।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि गार्गी सिंह पटेल पर हुए हमले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए। साथ ही, सभी राजनीतिक दलों को दलगत और जातीय सीमाओं से ऊपर उठकर पीड़ित के साथ न्याय की मांग करनी चाहिए, ताकि लोकतंत्र में जनता का विश्वास बना रहे।

PDA और हिंदुत्व के जमूरों से आप सुरक्षा और सम्मान की उम्मीद मत पालें। कुर्मियो को वायलेंस का जबाब वायलेंस से ही देना होगा, अन्यथा कोई भी आपके घर में घुसकर यू ही आपकी इज्जत और जीवन को तार -तार करता रहेगा और नेता सेलेक्टिव होकर दलाली करते रहेंगे।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या किसी भी नागरिक पर हुए हमले को केवल कानून और न्याय के नजरिए से देखा जाएगा, या फिर राजनीतिक और सामाजिक पहचानें ही प्रतिक्रियाओं का आधार बनती रहेंगी?