राष्ट्र प्रेरणा स्थल और सत्ता का चयनात्मक राष्ट्रवाद
लखनऊ में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 65 एकड़ में “राष्ट्र प्रेरणा स्थल” का निर्माण किया गया है। इसमें अटल बिहारी वाजपेयी, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दीन दयाल उपाध्याय की भव्य प्रतिमाएँ स्थापित हैं, साथ ही आधुनिक म्यूजियम भी बनाया गया है। सरकार इसे राष्ट्रवाद और प्रेरणा का प्रतीक बता रही है और मीडिया इसे विकास का प्रतीक कहकर दिखा रहा है।
लेकिन सवाल यह है कि जब सरदार वल्लभभाई पटेल की मूर्ति बनी थी, तब यही देश हिल क्यों गया था?
तब उस समय—
- मीडिया ने चौबीसों घंटे बहस चलाई
- विपक्षी दलों ने “पैसे की बर्बादी” और “संवैधानिक मर्यादा” की दुहाई दी
- आदिवासी, किसान, गरीब की दुहाई दी गई
आज वही सवाल, वही तर्क, वही पैसा—
लेकिन सब चुप हैं आज वही तंत्र, वही मीडिया, वही विपक्ष पूरी तरह खामोश क्यों है?
क्या इसलिए कि सरदार पटेल एक गैर-सामंतवादी, राष्ट्रीय एकता के प्रतीक और किसान-पिछड़े समाज से जुड़े नेता थे?
क्या आज—
- पैसे की कीमत खत्म हो गई?
- गरीब अचानक अमीर हो गया?
- या फिर सवाल पूछने की हिम्मत ही छीन ली गई?
- यह चुप्पी संयोग नहीं, मनुवादी चयन है
सामंतवाद हमेशा से चयनात्मक रहा है। जो प्रतीक उसके वैचारिक ढांचे में फिट हों उन पर चुप्पी। जो प्रतीक सामाजिक न्याय, एकता और बराबरी की बात करें उन पर हमला।
यही है सामंतवाद का असली चेहरा— जहाँ चयन होता है कि
- किसकी मूर्ति पर सवाल उठेंगे
- और किसकी प्रतिमा पर तालियाँ बजेंगी
सामंतवाद को समस्या मूर्ति से नहीं, मूर्ति किसकी है—इससे होती है।
जब बहुजन, किसान, श्रमिक या गैर-सामंतवादी नेतृत्व की पहचान उभरती है,
तो अचानक—
- संविधान याद आ जाता है
- खर्च याद आ जाता है
- पर्यावरण और विकास की चिंता जाग जाती है
लेकिन आज जिन व्यक्तित्वों की प्रतिमाएं लग रही हैं, वे एक विशेष विचारधारा के प्रतीक हैं। जब सत्ता-समर्थित, सामंतवादी विचारधारा के प्रतीक खड़े होते हैं, तो पूरा तंत्र कोडीन सीरप पीकर सो जाता है।
इसलिए—
मीडिया मौन है
कोर्ट शांत है
विपक्ष निष्क्रिय है
यह सवाल व्यंग्य नहीं, कटु सत्य है आज असहमति अपराध बन चुकी है और सहमति पुरस्कार।
यह लेख किसी व्यक्ति विशेष के विरोध में नहीं, बल्कि दोहरे मापदंड और वैचारिक पक्षपात के खिलाफ है।
अगर मूर्तियाँ गलत हैं तो सब गलत हैं। अगर प्रेरणा जरूरी है तो हर वर्ग के नायकों से होनी चाहिए।
सामंतवाद को न मूर्तियों से समस्या है, न खर्च से
उसे समस्या है समानता, सामाजिक न्याय और समावेशी राष्ट्रवाद से।
देश को सामंतवाद नहीं, संविधान चाहिए।
देश को चयनित राष्ट्रवाद नहीं, समान न्याय चाहिए।
अब सवाल सिर्फ पूछना नहीं,
इस चुप्पी को तोड़ना भी जरूरी है।
निष्कर्ष
राष्ट्र प्रेरणा तब होगी जब हर महापुरुष को बराबर सम्मान मिले
सवाल पूछना देशद्रोह न कहलाए और इतिहास को वैचारिक चश्मे से नहीं, सच्चाई से देखा जाए
समाज से जुड़ी अपडेट पाने के लिए Kurmi World से जुड़े (लिंक पर क्लिक करके )
