अखिल भारतीय कुर्मी क्षत्रिय महासभा , क्या संगठन सिर्फ़ मृत्यु भोज और दहेज तक सीमित रह गया है?
श्रावस्ती जनपद में अखिल भारतीय कुर्मी क्षत्रिय महासभा के जिला अध्यक्ष पर सरेआम गोली चलना और आरोपी का आराम से निकल जाना न सिर्फ़ सरकार की विफलता है, बल्कि संगठन की चुप्पी पर भी बड़ा सवाल है ।
अखिल भारतीय कुर्मी क्षत्रिय महासभा खुद को समाज का प्रतिनिधि संगठन बताती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि संगठन की सक्रियता मृत्यु भोज बंद कराने, दहेज उन्मूलन और कुछ सामाजिक रस्मों तक ही सीमित होकर रह गई है। सवाल यह है कि क्या समाज की समस्याएँ सिर्फ़ यहीं तक सीमित हैं?
आज कुर्मी समाज जिन गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है जैसे सुरक्षा, न्याय, राजनीतिक हिस्सेदारी, शिक्षा, रोजगार और प्रशासनिक उत्पीड़न उन पर महासभा की भूमिका लगभग मौन दिखाई देती है।
हाल की घटनाओं ने संगठन की कार्यशैली पर और भी बड़े प्रश्न खड़े कर दिए हैं। जब समाज के पदाधिकारी ही सरेआम हिंसा का शिकार हो रहे हैं और संगठन की ओर से कोई ठोस, प्रभावी और निर्णायक हस्तक्षेप सामने नहीं आता, तब यह सोचना स्वाभाविक है कि महासभा समाज के वास्तविक संघर्षों से कतराती क्यों नज़र आती है।
मृत्युभोज और दहेज उन्मूलन जैसे सामाजिक सुधार निस्संदेह आवश्यक हैं, लेकिन संगठन का दायित्व केवल सामाजिक रस्मों तक सीमित नहीं हो सकता ।
एक मज़बूत सामाजिक संगठन वही होता है जो
1. अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ उठाए,
2. पीड़ित को न्याय दिलाने के लिए सड़क से प्रशासन तक दबाव बनाए,
3. समाज के सम्मान व सुरक्षा की गारंटी के लिए संघर्ष करे।
अब समय है सवाल पूछने का, जवाब मांगने का और जवाबदेही तय करने का।
कुर्मी समाज अब खामोशी नहीं, कार्रवाई चाहता है
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि—
- जब अखिल भारतीय कुर्मी क्षत्रिय महासभा अपने ही पदाधिकारियों के लिए मजबूती से आवाज़ नहीं उठा पा रही है, तो वह कुर्मी समाज की आम जनता के हक़, सम्मान और सुरक्षा के लिए क्या संघर्ष करेगी?
- अगर संगठन अपने नेतृत्व की रक्षा नहीं कर सकता, तो समाज को न्याय दिलाने का दावा किस आधार पर करता है?
आज कुर्मी समाज यह पूछ रहा है—
- क्या महासभा सिर्फ़ सामाजिक आयोजनों की औपचारिकता बनकर रह गई है?
- क्या नेतृत्व में वह साहस नहीं बचा जो सत्ता और प्रशासन से सवाल पूछ सके?
- क्या समाज को सिर्फ़ उपदेश दिए जाएंगे, जबकि संकट के समय उसे अकेला छोड़ दिया जाएगा?
- क्या अन्याय के खिलाफ़ खड़े होने का साहस अब खत्म हो चुका है और क्या समाज की उम्मीदों को यूँ ही कुचल दिया जाएगा?
- क्या संगठन सिर्फ़ पद और नाम तक सीमित रह गया है?
अगर अखिल भारतीय कुर्मी क्षत्रिय महासभा को सच में समाज का नेतृत्व करना है, तो उसे कुर्सी, पद और औपचारिक बयानों से ऊपर उठकर समाज के मौलिक अधिकारों और न्याय की लड़ाई में उतरना होगा। संगठन ने स्पष्ट, ठोस और आक्रामक रुख नहीं अपनाया, तो यह माना जाएगा कि अखिल भारतीय कुर्मी क्षत्रिय महासभा समाज का नेतृत्व करने में असफल हो चुकी है।
अन्यथा इतिहास गवाह है—
जो संगठन समय पर अपनी भूमिका नहीं निभाते, उन्हें समाज खुद अप्रासंगिक बना देता है।
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