कुर्मी एकता की राह में गुटबाज़ी और निजी स्वार्थ बड़ी बाधा, नेतृत्व की कार्यशैली पर उठे सवाल
कुर्मी समाज को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से संगठित एवं सशक्त बनाने के लिए वर्षों से विभिन्न स्तरों पर प्रयास किए जा रहे हैं। समाज के नाम पर बड़े सम्मेलन आयोजित होते हैं, मंचों से एकता के संदेश दिए जाते हैं और सामूहिक उत्थान के दावे किए जाते हैं। इसके बावजूद समाज के भीतर गुटबाज़ी, आपसी खींचतान और व्यक्तिगत वर्चस्व की स्थिति बार-बार सामने आती रही है।
ऐसे में समाज के जागरूक लोगों के बीच यह सवाल चर्चा का विषय बन गया है कि आखिर वर्षों के प्रयासों के बाद भी “कुर्मी एकता” अपेक्षित रूप से मजबूत क्यों नहीं हो पा रही है। क्या इसके लिए बाहरी परिस्थितियां जिम्मेदार हैं या समाज के भीतर मौजूद अहंकार, चापलूसी, परिवारवाद और निजी स्वार्थ इसकी प्रमुख वजह हैं?
नेतृत्व की कार्यशैली पर उठ रहे सवाल
सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि कुर्मी समाज का प्रभावशाली नेतृत्व काफी हद तक आर्थिक और राजनीतिक रूप से संपन्न वर्ग के हाथों में है। आर्थिक रूप से सक्षम होना कोई दोष नहीं है, लेकिन जब नेतृत्व की प्राथमिकता समाज के अंतिम व्यक्ति की समस्याओं के बजाय व्यक्तिगत प्रतिष्ठा, प्रभाव और वर्चस्व बन जाए, तब संगठनात्मक एकता कमजोर होने लगती है।
कई स्थानों पर यह शिकायत भी सामने आती है कि योग्य, संघर्षशील और जमीनी कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी देने के बजाय परिवार के सदस्यों, करीबी लोगों और चापलूसी करने वालों को प्राथमिकता दी जाती है। इससे समाज का एक बड़ा वर्ग स्वयं को उपेक्षित महसूस करता है और एकता की भावना केवल मंचों, सम्मेलनों एवं सामूहिक तस्वीरों तक सीमित रह जाती है।
व्यक्ति-पूजा नहीं, विचार और योग्यता को मिले महत्व
समाज के भीतर अब यह मांग भी उठ रही है कि व्यक्ति-पूजा की संस्कृति को छोड़कर विचार, योग्यता, संघर्ष और सामाजिक योगदान को प्राथमिकता दी जाए। किसी भी समाज को एक परिवार, संगठन या नेता की निजी जागीर नहीं माना जा सकता।
समाज का वास्तविक नेतृत्व उसी व्यक्ति के हाथों में होना चाहिए, जो बिना भेदभाव के लोगों के सम्मान, अधिकार, शिक्षा, रोजगार और भविष्य के लिए ईमानदारी से कार्य करे। इसके लिए संगठनों को अपनी कार्यप्रणाली अधिक पारदर्शी और लोकतांत्रिक बनानी होगी।
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सामाजिक संगठनों को करना होगा आत्ममंथन
समाज के लोगों के सामने कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े हैं। क्या संगठनों में जिम्मेदारियां योग्यता के आधार पर दी जा रही हैं? क्या गरीब, किसान, युवा, महिलाएं और जमीनी कार्यकर्ता निर्णय प्रक्रिया में शामिल हैं? क्या मतभेदों को भुलाकर समाजहित को व्यक्तिगत हित से ऊपर रखा जा रहा है?
सामाजिक चिंतकों का मानना है कि किसी भी समाज को बाहरी विरोध से उतना नुकसान नहीं होता, जितना उसके भीतर मौजूद अहंकार, गुटबाज़ी, चापलूसी और स्वार्थ से होता है। इन कमजोरियों के कारण प्रतिभाशाली लोग पीछे रह जाते हैं और संगठन छोटे-छोटे गुटों में बंट जाते हैं।
एक-दूसरे को आगे बढ़ाना ही वास्तविक एकता
कुर्मी समाज की वास्तविक एकता तभी संभव होगी, जब नेतृत्व और संगठन योग्य लोगों को आगे बढ़ाने का साहस दिखाएं। केवल एक मंच पर खड़े होकर फोटो खिंचवाना, सम्मेलन आयोजित करना या भाषण देना एकता का प्रमाण नहीं हो सकता।
एकता का वास्तविक अर्थ है—आपसी मतभेदों के बावजूद समाजहित में साथ खड़ा होना, कमजोर व्यक्ति की आवाज बनना और योग्य कार्यकर्ताओं को बिना भेदभाव आगे बढ़ाना। जिस दिन समाज अहंकार, गुटबाज़ी, चापलूसी और निजी स्वार्थ पर विजय प्राप्त कर लेगा, उस दिन उसकी सामाजिक एवं राजनीतिक शक्ति को मजबूत होने से कोई नहीं रोक पाएगा।
