रणनीति उनकी , उपेक्षा हमारी आखिर कब जागेगा कुर्मी समाज
आज कुर्मी समाज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ हत्या, हमले और अपमान हमारी नियति बनते जा रहे हैं और सत्ता के गलियारों में बैठी सामंतवादी–मनुवादी ताकतें इसे सामान्य घटना की तरह टाल दे रही हैं। हाल की कुर्मी समाज से जुड़ी हत्याएँ और मर्डर केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं हैं, बल्कि यह उस गहरी साजिश का संकेत हैं, जिसमें एक मेहनतकश, उत्पादनशील और संख्या में मजबूत समाज को डराकर, दबाकर और हाशिये पर रखने की कोशिश की जा रही है।
सवाल यह है कि जब ठाकुर और ब्राह्मण वर्ग हर दल में बैठकर अपने समाज की सुरक्षा, सत्ता और वर्चस्व के लिए रणनीति बना सकता है, तो कुर्मी समाज की जान इतनी सस्ती क्यों है?
क्यों हर हत्या के बाद सिर्फ शोक-संवेदना आती है, न्याय नहीं?
क्यों आरोपी खुलेआम घूमते हैं और पीड़ित परिवार दर-दर भटकता है?
सबसे चिंताजनक बात यह है कि हमारे पास आज 41 विधायक, 11 सांसद, केंद्रीय मंत्री, राज्य में आधा दर्जन मंत्री और सत्ताधारी दल में प्रदेश अध्यक्ष तक हैं। इसके बावजूद भी जब कुर्मी समाज के किसी बेटे की हत्या होती है, किसी किसान, प्रधान या कार्यकर्ता पर गोली चलती है, तो सत्ता की प्रतिक्रिया कमजोर, औपचारिक और खोखली क्यों रहती है?
यह केवल प्रशासन की नाकामी नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक चुप्पी का नतीजा भी है।
हम संख्या में मजबूत हैं, लेकिन संगठन में कमजोर।
हम सत्ता के साझेदार हैं, लेकिन निर्णय की मेज से दूर।
कुर्मी समाज को यह समझना होगा कि हत्याएँ केवल व्यक्ति की नहीं होतीं
वे समाज के आत्मसम्मान, सुरक्षा और भविष्य पर हमला होती हैं।
अगर आज हमने इन घटनाओं को “एक और केस” मानकर छोड़ दिया, तो कल यह सिलसिला और तेज़ होगा।
अब समय आ गया है कि कुर्मी समाज—
- हर हत्या और हमले को सामूहिक मुद्दा बनाए
- अपने जनप्रतिनिधियों से सख्त जवाबदेही तय करे
- और स्पष्ट संदेश दे कि कुर्मी समाज की जान सस्ती नहीं है
यह लेख नफरत फैलाने के लिए नहीं, बल्कि नींद तोड़ने के लिए है।
अगर अब भी हम नहीं जागे, तो इतिहास यही लिखेगा—
रणनीति उनकी थी, उपेक्षा हमारी… और चुप्पी ने हत्याओं को बढ़ावा दिया।
अब फैसला कुर्मी समाज को करना है—
डरकर जीना है, या संगठित होकर न्याय लेना है।
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