जब वे संगठित हैं, तो हम बिखरे क्यों? कुर्मी समाज के नाम एक खुला पत्र

प्रिय समाजबंधुओं,

यह पत्र किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि पूरे कुर्मी समाज की अंतरात्मा को झकझोरने के लिए लिखा जा रहा है। आज जब हम चारों ओर देखते हैं, तो एक कड़वी सच्चाई सामने खड़ी है कुर्मी समाज पर लगातार जानलेवा हमले, हत्याएँ और अत्याचार हो रहे हैं, लेकिन सत्ता के गलियारों में बैठा हमारा प्रतिनिधित्व खामोश है।

लगातार ऐसी घटनाएँ सामने आ रही हैं जहाँ हमारे समाज के लोगों को निशाना बनाया गया—कहीं गोली मारी गई, कहीं सरेआम हत्या, कहीं झूठे मुकदमों में फँसाया गया। सवाल यह नहीं है कि अत्याचार हो रहा है या नहीं, सवाल यह है कि जब अत्याचार हो रहा है, तब हमारी आवाज़ कहाँ है?

हमारे पास सांसद हैं, विधायक हैं, बड़े-बड़े पदों पर बैठे लोग हैं, फिर भी—

  • न संसद में गूंज सुनाई देती है
  • न विधानसभा में आक्रोश दिखता है
  • न सड़कों पर संगठित प्रतिरोध नज़र आता है

क्या हमारी भूमिका सिर्फ़ वोट डालने तक सीमित रह गई है?

क्या चुनाव के बाद हम केवल आँकड़े बनकर रह जाते हैं?

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि दूसरे समाज जब अपने ऊपर हुए एक छोटे से अन्याय पर भी एकजुट होकर खड़े हो जाते है, तब कुर्मी समाज—जो संख्या, मेहनत और राजनीतिक ताक़त में किसी से कम नहीं—बिखरा हुआ क्यों दिखाई देता है?

  • हमारे सांसद और विधायक क्या सिर्फ़ पार्टी के अनुशासन के लिए हैं?
  • क्या समाज के खून से ज़्यादा क़ीमती उनकी कुर्सी है?
  • अगर वे बोल नहीं सकते, तो हमें उन्हें जवाबदेह बनाना होगा।

यह पत्र किसी को उकसाने के लिए नहीं है, बल्कि जगाने के लिए है।

अब समय आ गया है कि—

  • हम हर हत्या और हर हमले पर सामूहिक सवाल उठाएँ
  • अपने प्रतिनिधियों से खुले मंच पर जवाब माँगें
  • संगठन को केवल रस्मों से निकालकर संघर्ष का औज़ार बनाएँ

अगर आज भी हम चुप रहे, तो कल इतिहास हमें माफ़ नहीं करेगा।

याद रखिए जो समाज अपने लोगों की रक्षा नहीं कर पाता, उसकी राजनीतिक ताक़त केवल भ्रम होती है।

अब फैसला हमें करना है—

बिखरे रहकर शिकार बनते रहेंगे, या संगठित होकर सम्मान और सुरक्षा हासिल करेंगे।

कुर्मी समाज जागो।

सवाल पूछो।

संगठित हो।

यही इस खुले पत्र का उद्देश्य है।

एक चिंतित समाजसेवी