राजनीतिक ताकत के बावजूद कुर्मी समाज हाशिये पर क्यों?
यह सवाल आज हर जागरूक कुर्मी के मन में उठ रहा है—
जब हमारे पास विधायक हैं, सांसद हैं, मंत्री हैं, सत्ता में भागीदारी है, फिर भी कुर्मी समाज बार-बार उपेक्षा, अन्याय और हिंसा का शिकार क्यों बनता है?
कुर्मी समाज संख्या में मजबूत है, मेहनतकश है और देश-प्रदेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहा है। खेती से लेकर राजनीति तक, हर क्षेत्र में समाज ने योगदान दिया है। आज स्थिति यह है कि 41 विधायक, 11 सांसद, केंद्रीय मंत्री, राज्य में कई मंत्री और सत्ताधारी दल में प्रदेश अध्यक्ष जैसे पद हमारे समाज के पास हैं। इसके बावजूद जमीनी सच्चाई यह है कि कुर्मी समाज को न तो अपेक्षित सम्मान मिल रहा है, न सुरक्षा और न ही निर्णायक हिस्सेदारी।
इसका पहला और सबसे बड़ा कारण है—संगठन की कमजोरी।
दूसरे समाज सत्ता में कम संख्या में होते हुए भी एकजुट रहते हैं। वे अपने लोगों पर हमला होने पर सामूहिक दबाव बनाते हैं, सड़क से सदन तक आवाज़ उठाते हैं। वहीं कुर्मी समाज अक्सर अलग-अलग खेमों में बंटा नजर आता है। हमारे जनप्रतिनिधि पार्टी के प्रति ज्यादा वफादार दिखते हैं, समाज के प्रति कम।
दूसरा कारण है—राजनीतिक ताकत का सामाजिक ताकत में न बदल पाना।
वोट तो कुर्मी समाज देता है, लेकिन बदले में नीति, प्रशासन और निर्णय प्रक्रिया में हिस्सेदारी नहीं ले पाता। परिणाम यह होता है कि जब किसी कुर्मी की हत्या होती है, किसी किसान, प्रधान या कार्यकर्ता पर हमला होता है, तो मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है।
तीसरा कारण है—हमारी चुप्पी।
हर घटना के बाद कुछ दिन गुस्सा, सोशल मीडिया पर पोस्ट, फिर सन्नाटा। न कोई स्थायी आंदोलन, न कोई साझा रणनीति। यह चुप्पी ही सामंतवादी-मनुवादी ताकतों को यह संदेश देती है कि कुर्मी समाज को दबाना आसान है।
सच यह है कि कुर्मी समाज को आज भी सिर्फ वोट बैंक समझा जा रहा है, निर्णय लेने वाला समाज नहीं । जब तक यह सोच नहीं बदलेगी, तब तक राजनीतिक पद केवल नाम के रह जाएंगे।
अब समय आ गया है कि कुर्मी समाज आत्ममंथन करे—
- अपने जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछे
- हर अन्याय को पूरे समाज का मुद्दा बनाए
- और स्पष्ट कहे कि अब उपेक्षा बर्दाश्त नहीं की जाएगी
यह लेख किसी दल या व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि कुर्मी समाज को जगाने का प्रयास है।
अगर आज भी हम नहीं जागे, तो इतिहास यही लिखेगा कि ताकत होते हुए भी कुर्मी समाज हाशिये पर ही रहा
अब फैसला हमारे हाथ में है—
हाशिये पर रहना है या इतिहास बदलना है।
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