“अब भी नहीं जागे तो कब? कुर्मी समाज के नाम खुला पत्र”

Admin

कुर्मी समाज के नाम एक खुला पत्र

प्रिय कुर्मी समाज के साथियों,

जरा ठहरकर सोचिए—

आज देश और प्रदेश की राजनीति में सामंतवाद को कायम रखने के लिए किस तरह बंद कमरों में बैठकें हो रही हैं। रणनीति बना रहे हैं, ब्राह्मण विधायक अपने समाज को मजबूत करने, आपस में तालमेल बनाने और सत्ता व व्यवस्था पर अपना दबदबा बनाए रखने की रणनीति गढ़ रहे हैं।

और दूसरी ओर हम हैं—

गिनने को 41 विधायक, 11 सांसद, एक केंद्रीय मंत्री, राज्य में लगभग आधा दर्जन मंत्री, सत्ताधारी दल में प्रदेश अध्यक्ष तक।

यह हमारे लिए अपमानजनक भी है और चेतावनी भी।

सवाल यह नहीं है कि हमारे पास संख्या कम है या ताकत नहीं—

सवाल यह है कि क्या हम अपनी ताकत का सही इस्तेमाल कर पा रहे हैं?

क्या हमारे जनप्रतिनिधि समाज के स्वाभिमान और हिस्सेदारी की लड़ाई मजबूती से लड़ रहे हैं?

या फिर हम सिर्फ सत्ता की शोभा बनकर रह गए हैं?

कुर्मी समाज मेहनतकश, उत्पादनशील और राष्ट्रनिर्माता समाज है। हमने हर दौर में खेत, कारखाने और सीमाओं तक देश को सींचा है। लेकिन आज अगर हम राजनीतिक रूप से सजग नहीं हुए, संगठित नहीं हुए और अपने हक के लिए स्पष्ट आवाज़ नहीं उठाई, तो हमारी उपेक्षा ऐसे ही होती रहेगी।

यह खुला पत्र आरोप नहीं, आत्ममंथन है।

यह नफरत नहीं, चेतना का आह्वान है।

अब समय आ गया है कि—

  • अगर अपने प्रतिनिधियों से जवाबदेही तय नहीं की,
  • संख्या की राजनीति को सम्मान और हिस्सेदारी की राजनीति में बदला जाए
  • और कुर्मी समाज अपनी एकजुट ताकत से यह संदेश दे कि हम केवल वोट बैंक नहीं, बल्कि निर्णय लेने वाली शक्ति हैं।

अगर आज भी हम नहीं जागे, तो इतिहास यही लिखेगा कि ताकत होते हुए भी कुर्मी समाज को हाशिये पर रखा गया। तो हमारी संख्या, हमारी कुर्बानी और हमारी शक्ति—सब बेकार कर दी जाएगी।

अब फैसला हमें करना है।

जागना है—या फिर यूँ ही गाजर-मूली बने रहना है।

अब भावनाओं से नहीं, रणनीति से चलो।

अब भीख नहीं, हक की राजनीति करो।

वरना इतिहास गवाह होगा—ताकत होते हुए भी हम ठगे गए।

एक चिंतित कुर्मी

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