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रेतीली जमीन पर 54 हजार आम के पौधे, इजरायली तकनीक से लाखों कमा रहे विजय पाल पटेल
70 एकड़ में विकसित किया विशाल आम का बाग, बैगिंग तकनीक से आम की गुणवत्ता और कीमत दोनों में हुआ इजाफा
नरसिंहपुर। कभी खेती के लिए अनुपयुक्त मानी जाने वाली नरसिंहपुर जिले के गाडरवारा क्षेत्र स्थित छेना कच्छर गांव की रेतीली जमीन अब किसानों के लिए एक सफल कृषि मॉडल बन गई है। किसान विजय पाल सिंह पटेल ने आधुनिक और इजरायली तकनीक की मदद से नदी किनारे की जमीन पर विशाल आम का बाग विकसित कर लाखों रुपये की आय का रास्ता तैयार किया है।
57 वर्षीय विजय पाल सिंह पटेल मूल रूप से छिंदवाड़ा के रहने वाले हैं। भूविज्ञान में एमएससी की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने पारंपरिक फसलों के बजाय बागवानी को चुना। वर्तमान में उन्होंने लगभग 70 एकड़ जमीन पर आम का बाग विकसित किया है, जिसमें विभिन्न देशी और विदेशी किस्मों के करीब 54 हजार पौधे लगे हैं।
इजरायल की अल्ट्रा हाई-डेंसिटी तकनीक का प्रयोग
विजय पाल पटेल ने बाग लगाने के लिए इजरायल की ‘अल्ट्रा हाई-डेंसिटी’ तकनीक अपनाई है। सामान्य तौर पर एक एकड़ जमीन में 65 से 100 आम के पौधे लगाए जाते हैं, जबकि इस तकनीक से प्रति एकड़ 400 से 1400 तक पौधे लगाए जा सकते हैं। इस तकनीक में पौधों को कम दूरी पर लगाया जाता है और उनकी ऊंचाई नियंत्रित रखी जाती है। इससे पौधों की देखभाल, कटाई और फलों की तुड़ाई आसान हो जाती है। बागवानी विभाग के अनुसार, पौधों को लगभग चार-चार फुट की दूरी पर लगाया जाता है और उनकी अधिकतम ऊंचाई करीब 10 फुट तक रखी जाती है।
बाग में आम की कई किस्में
पटेल के बाग में केसर, जंबो केसर, लंगड़ा सहित विभिन्न प्रजातियों के आम लगाए गए हैं। करीब 600 पौधे केसर किस्म के बताए गए हैं। उनकी कुल 70 एकड़ जमीन में से लगभग 45 एकड़ क्षेत्र में केसर और जंबो केसर किस्म के आम लगे हैं। विजय पाल पटेल के अनुसार, बाग लगाने के शुरुआती तीन वर्षों में उत्पादन कम और लागत अधिक रहती है। इसी कारण कई किसान बागवानी से दूरी बनाते हैं। हालांकि, एक बार बाग पूरी तरह विकसित होने के बाद प्रति एकड़ दो लाख रुपये तक की आमदनी संभव है।
प्रति एकड़ पांच टन तक मिला उत्पादन
पिछले वर्ष उनके बाग से करीब पांच टन प्रति एकड़ तक आम का उत्पादन हुआ था। इस वर्ष ओलावृष्टि और तेज हवाओं के कारण उत्पादन प्रभावित हुआ। सामान्य परिस्थितियों में उन्हें प्रति एकड़ लगभग 10 टन तक उत्पादन मिलने की उम्मीद थी। बागवानी अधिकारी सीमा केवट के अनुसार, विजय पाल पटेल को आम की खेती से अच्छा लाभ हो रहा है। वह आधुनिक तकनीक के माध्यम से रेतीली जमीन को उपयोगी बनाकर अन्य किसानों के लिए प्रेरणा प्रस्तुत कर रहे हैं।
बैगिंग तकनीक से दोगुनी कीमत
आम की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए विजय पाल पटेल ‘बैगिंग तकनीक’ का भी इस्तेमाल करते हैं। इस तकनीक में आम के फलों को विशेष प्रकार के थैलों से ढक दिया जाता है। इससे फल कीटों, पक्षियों और मौसम के प्रभाव से सुरक्षित रहते हैं। बैगिंग से आमों का रंग, चमक और गुणवत्ता बेहतर होती है। इसके कारण बाजार में सामान्य आम की तुलना में अधिक कीमत मिलती है। पटेल के अनुसार, इस वर्ष केसर आम 172 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिका, जबकि लंगड़ा आम की कीमत 80 से 120 रुपये प्रति किलोग्राम के बीच रही। उनका कहना है कि बैगिंग तकनीक का उपयोग नहीं किया जाए तो इन्हीं आमों की कीमत लगभग आधी रह सकती है। उनके बाग के आम इंदौर, जयपुर, गुजरात सहित देश के कई प्रमुख शहरों के बाजारों में भेजे जाते हैं।
कई संस्थानों से लिया प्रशिक्षण
आधुनिक बागवानी को समझने के लिए विजय पाल सिंह पटेल ने देश के कई प्रमुख कृषि संस्थानों से प्रशिक्षण प्राप्त किया है। उन्होंने लखनऊ के रहमानखेड़ा स्थित आईसीएआर-केंद्रीय उपोष्णकटिबंधीय बागवानी संस्थान और राज्य कृषि प्रबंधन संस्थान से आम और अमरूद की खेती का प्रशिक्षण लिया। इसके अलावा उन्होंने नई दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा से भी प्रशिक्षण प्राप्त किया। वहां उन्होंने गेहूं, धान और विभिन्न सब्जियों की उन्नत किस्मों और आधुनिक कृषि तकनीकों के बारे में जानकारी हासिल की।
किसानों और कृषि छात्रों को दे रहे प्रशिक्षण
विजय पाल पटेल अपनी तकनीक और अनुभव को दूसरे किसानों तथा कृषि की पढ़ाई कर रहे विद्यार्थियों के साथ भी साझा करते हैं। उनके बाग का भ्रमण करने वाले छात्रों को अल्ट्रा हाई-डेंसिटी तकनीक, पौधों की देखभाल, उत्पादन और विपणन की जानकारी दी जाती है। विजय पाल पटेल ने किसानों से आधुनिक बागवानी तकनीक अपनाने की अपील की है। उनका कहना है कि किसान शुरुआत में कम से कम 100 पौधे लगाकर भी इस मॉडल को अपना सकते हैं। सही प्रशिक्षण और नियमित देखभाल से बागवानी किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। रेतीली जमीन पर आम का सफल बाग तैयार करने का उनका प्रयोग न केवल नरसिंहपुर के किसानों के लिए मिसाल बन रहा है, बल्कि इससे स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिल रहा है।
