सुरगांव जोशी। कोरोना महामारी के दौरान कोचिंग बंद होने से आय का जरिया छिना तो नंदकिशोर पटेल ने मत्स्य पालन में नई संभावनाएं तलाशीं। मत्स्य विभाग के मार्गदर्शन और प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना से मिली सहायता के सहारे उन्होंने व्यवसाय शुरू किया। बेहतर प्रबंधन और तकनीकी देखरेख से उनका सालाना मछली उत्पादन लगभग 70 टन और कारोबार का वार्षिक टर्नओवर करीब 90 लाख रुपये तक पहुंच गया है।
हर महीने 40 हजार रुपये की आय से चलता था परिवार
महामारी से पहले पटेल कोचिंग चलाते थे। इससे उन्हें हर महीने करीब 40 हजार रुपये की आय होती थी, जिससे परिवार का खर्च चलता था। कोरोना के दौरान कोचिंग बंद हुई तो उनके सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया। उन्होंने स्वरोजगार के विकल्प तलाशे और गांव में मत्स्य पालन शुरू करने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्होंने मत्स्य विभाग से तकनीकी जानकारी और आर्थिक सहायता के संबंध में संपर्क किया।
14 लाख रुपये की बायोफ्लॉक इकाई पर मिला 40 प्रतिशत अनुदान
मत्स्य विभाग के मार्गदर्शन में पटेल ने प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना का लाभ लिया। उन्होंने 14 लाख रुपये की लागत से 0.1 हेक्टेयर क्षेत्र में बायोफ्लॉक इकाई स्थापित की। इस परियोजना पर उन्हें 40 प्रतिशत सरकारी अनुदान मिला। इसके साथ ही उन्होंने 0.5 हेक्टेयर के तालाब में भी मछली पालन शुरू किया।
उत्पादन बेहतर बनाने के लिए उन्होंने उन्नत मत्स्य बीज, संतुलित आहार और पानी की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिया। नियमित तकनीकी देखरेख और व्यवस्थित प्रबंधन से उत्पादन बढ़ाने में मदद मिली।
छह महीने में करीब 35 टन उत्पादन
पटेल की इकाई और तालाब से अब हर छह महीने में लगभग 35 टन मछली का उत्पादन हो रहा है। इस तरह सालाना उत्पादन करीब 70 टन है। व्यवसाय से उनकी शुद्ध वार्षिक आय लगभग 40 लाख रुपये बताई गई है।
पटेल का कहना है कि योजना से मिली सहायता के बिना व्यवसाय शुरू करना मुश्किल था। सरकारी अनुदान और तकनीकी मार्गदर्शन ने उन्हें नया काम शुरू करने तथा आत्मनिर्भर बनने का अवसर दिया।