लखनऊ। लखनऊ खंड स्नातक क्षेत्र के एमएलसी एवं भाजपा प्रत्याशी इंजीनियर अवनीश कुमार सिंह से जुड़ी एक पहल में कुर्मी समाज के इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन में समाज के योगदान को सामने लाने का प्रयास दिखाई देता है।
रायबरेली की बछरावां विधानसभा क्षेत्र स्थित ग्राम सभा सहन्गो का इतिहास वर्ष 1921 के किसान आंदोलन से जुड़ा है। उपलब्ध दस्तावेज़ के मुताबिक अंग्रेजी हुकूमत द्वारा आंदोलनकारियों पर गोली चलाए जाने की घटना में स्थानीय किसानों ने बलिदान दिया था। शहीदों की स्मृति को जीवंत बनाए रखने के लिए ग्रामीण करीब एक शताब्दी से भव्य स्मारक की प्रतीक्षा कर रहे थे। अब पर्यटन विभाग द्वारा स्मारक का निर्माण कराया गया है तथा शहीदों की प्रतिमाएं भी स्थापित की गई हैं।
कुर्मी समाज के इतिहास को सामने लाने का प्रयास
सहन्गो और आसपास का क्षेत्र कुर्मी समाज की बड़ी आबादी वाला इलाका है और दस्तावेज़ में इन शहीदों का संबंध भी कुर्मी समाज से बताया गया है। ऐसे में यह स्मारक केवल एक स्थानीय निर्माण नहीं, बल्कि कुर्मी समाज के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान और उसकी ऐतिहासिक विरासत को नई पीढ़ी के सामने लाने का माध्यम भी बन सकता है।
अवनीश कुमार सिंह से जुड़ी यह पहल इसलिए भी ध्यान खींचती है क्योंकि इसके केंद्र में केवल वर्तमान राजनीति नहीं, बल्कि समाज के इतिहास को खोजना, पुरानी पीढ़ियों के योगदान को सामने लाना और उनकी स्मृतियों को संरक्षित करना भी शामिल है। कुर्मी क्षत्रिय सभा लखनऊ की वेबसाइट भी अवनीश सिंह से जुड़ी ऐसी सामाजिक-सांस्कृतिक पहलों का उल्लेख करती है।
चुनाव में समाज की विरासत भी बनी चर्चा का विषय
लखनऊ खंड स्नातक चुनाव में विभिन्न दलों के प्रत्याशी मैदान में हैं। हाल की चुनावी रिपोर्ट के अनुसार भाजपा ने अवनीश कुमार सिंह को प्रत्याशी बनाया है, जबकि अन्य दलों के उम्मीदवार भी चुनाव लड़ रहे हैं।
ऐसे में कुर्मी समाज के भीतर यह सवाल भी स्वाभाविक रूप से उठ रहा है कि चुनाव लड़ने वाले प्रतिनिधियों ने समाज की ऐतिहासिक धरोहर, महापुरुषों, स्वतंत्रता सेनानियों और सामाजिक पहचान को सहेजने के लिए अब तक कौन-कौन से ठोस प्रयास किए हैं।
अवनीश कुमार सिंह से जुड़ी सहन्गो स्मारक जैसी पहल का रिकॉर्ड सामने है। वहीं अन्य प्रत्याशियों द्वारा कुर्मी समाज की ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित करने की इसी प्रकार की पहल का कोई प्रमाण उपलब्ध सामग्री में सामने नहीं आता। इसे अंतिम निष्कर्ष मानने के बजाय संबंधित प्रत्याशियों के सार्वजनिक रिकॉर्ड और कार्यों के आधार पर परखा जाना उचित होगा।
विरासत केवल इतिहास नहीं, आने वाली पीढ़ियों की पहचान भी
किसी समाज की पहचान केवल उसकी वर्तमान राजनीतिक भागीदारी से नहीं, बल्कि उसके इतिहास, संघर्ष और बलिदान से भी बनती है। सहन्गो के शहीदों की स्मृति को संरक्षित करने का प्रयास इसी सोच को आगे बढ़ाता है—कि नई पीढ़ी अपने पूर्वजों के योगदान को जाने और अपनी सामाजिक जड़ों से जुड़े।
अब चर्चा केवल चुनाव की नहीं, बल्कि इस सवाल की भी है कि समाज का प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाले लोगों ने कुर्मी समाज की विरासत को खोजने, संजोने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए क्या ठोस काम किए हैं