विट्ठलभाई पटेल के शताब्दी वर्ष पर विशेष डाक टिकट होगा जारी

विट्ठलभाई पटेल के शताब्दी वर्ष पर विशेष डाक टिकट होगा जारी

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह आगामी 'ऑल इंडिया स्पीकर्स कॉन्फ्रेंस' में विठ्ठलभाई पटेल के सम्मान में एक विशेष डाक टिकट जारी करेंगे। मालूम हो पटेल 24 अगस्त 1925 में केंद्रीय विधान सभा के पहले भारतीय अध्यक्ष चुने गए थे। संचार मंत्रालय एवं इंडिया पोस्ट के सहयोग से जारी होने वाला यह विशेष डाक टिकट विट्ठलभाई पटेल की महान संसदीय विरासत और उनके असाधारण योगदान को राष्ट्र की ओर से शताब्दी श्रद्धांजलि स्वरूप प्रस्तुत करेगा।

1925 में ही विट्ठल भाई पटेल केंद्रीय विधानसभा के पहले निर्वाचित अध्यक्ष (स्पीकर) हुए थे। यह उसका शताब्दी वर्ष है। इस उपलक्ष्य में एक विशेष डाक टिकट जारी किया जाएगा। 24 अगस्त को केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह यह डाक टिकट जारी करेंगे। इस अवसर पर केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया मौजूद रहेंगे।

विट्ठलभाई झावेरभाई पटेल के दूरदर्शी संसदीय योगदान और राष्ट्र-निर्माण में उनकी ऐतिहासिक भूमिका के सम्मान में ये किया जा रहा है। स्वतंत्रता संग्राम के एक योद्धा और संसदीय नेता के रूप में उन्होंने 24 अगस्त 1925 को इतिहास रचते हुए केंद्रीय विधान सभा के अध्यक्ष रहे। कार्यकाल की विशेषता रही—निष्पक्षता, संसदीय प्रक्रियाओं के प्रति अटूट आस्था, विधायिका की स्वतंत्रता की रक्षा, सशक्त बहस की संस्कृति को बढ़ावा और लोकतांत्रिक मूल्यों की सर्वोच्च प्रतिष्ठा।

 इससे पहले 27 सितंबर 1973 को उनकी जन्म शताब्दी के अवसर पर भी एक डाक टिकट जारी किया गया था, जो राष्ट्र द्वारा उनकी अतुलनीय सेवाओं के प्रति सम्मान का प्रतीक है।

विट्ठलभाई पटेल की शताब्दी पर आयोजित यह विमोचन, आगामी ऑल इंडिया स्पीकर्स कॉन्फ़्रेंस 2025 का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होगा। सम्मेलन में देशभर की विधानसभाओं व विधान परिषदों के सभापति, उपसभापति, अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष भाग लेंगे। सम्मेलन में संविधान की नींव, लोकतांत्रिक संस्थाओं के विकास तथा संसदीय कार्यप्रणाली में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा होगी।

इस विशेष डाक टिकट का विमोचन, भारत के लोकतांत्रिक सफ़र में विट्ठलभाई पटेल की स्मरणीय भूमिका को राष्ट्रीय श्रद्धांजलि स्वरूप प्रस्तुत करेगा। विशेष डाक टिकट अक्सर सीमित संख्या में जारी होते हैं। इसलिए उनका संग्रह भी किया जाता है। यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा बन जाते हैं। प्रतीकात्मक अंकन के माध्यम से उनके योगदान को अमर करते हुए राष्ट्र एक बार पुनः उनके प्रति अपनी गहरी श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करेगा—एक ऐसे नेता के प्रति, जिन्होंने न केवल विधायी इतिहास का स्वर्णिम अध्याय लिखा, बल्कि निःस्वार्थ सेवा, साहस और संसदीय लोकतंत्र के प्रति अटूट समर्पण का आदर्श भी स्थापित किया।

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